
मेरे पड़ोस में रहने वाली वो लड़की जिसे मुझसे हमदर्दी है जो शायद मेरा दर्द जानती है उससे फोन पर बात करते हुए आज यूँ महसूस हुआ कि शायद वो मेरा दर्द बाटना चाहती है|पर न जाने क्यों मेरा मन अब भी उलझन में फंसा हुआ है…..डर मुझपर हावी हो चूका है वो भी इस कदर की ख़ुशी की आहट भी ग़म के अंदेशे की मानिंद जान पड़ती है…..
मेरे मन का मकान
यूँ खाली तो नही
अरसा हो गया कि
कोई यहाँ आया तो नहीं
मगर मालूम होता है
इस बसंत फिर
किसी ने दस्तक दी तो है
वो दरवाज़े जो किसी
के जाने के बाद
मैंने बंद कर दिए थे
और वक़्त के साथ
जो जकड़ से गए हैं
उनपे अचानक हुई
इस दस्तक ने
मुझे बेचैन सा कर दिया है
मै मजबूर हो गया हूँ
एक बार फिर
सोचने पर
कि ये दरवाज़े
यु ही बंद रहने दूँ
या फिर खिड़की के छेद से
झाँक कर देखूं
कि कहीं अतीत मुह बाये
खड़ा तो नहीं
या फिर कही वो
लौट आये तो नहीं
जिन्होंने जाते वक़्त
मुड़ कर देखना भी मुनासिब न समझा था
या फिर कोई शख्स है
अनजाना सा जो
इस में रहना चाहता है
जो इन बेजान दीवारों पे
अपने ख्वाबो के रंग
सजाने के सपने संजोया
बैठा है दरवाज़े पे
जो इस घुटन भरे कमरे में
जान डालना चाहता है
जो इन बेरंग पर्दों को
एहसासों से भिगोना चाहता है
सोचता हूँ कि
फिर इस दिल के हिस्से
आती ज़िन्दगी इसके नाम कर दूं
पर फिर जब खोने के दर्द को
पाने कि ख़ुशी के साथ तोलता हूँ
तो दर्द का ही पलड़ा भारी दिखता है
और फिर मैंने ये तय कर लिया
कि कमरे कि दीवारे
सुनी भी अच्छी ही लगती है
अँधेरे का ये स्याह रंग
जो अब मेरी ज़िन्दगी बन चूका है
इसपे कोई रंग न ही चढ़े तो बेहतर होगा
और फिर क्या पता
उसने दस्तक ही न दी हो
बस एक भ्रम हो ये मेरा
महज़ एक छलावा
मैंने बस यही सोच कर
दरवाज़े बंद रखे
कि जिस दरवाज़े कि चौखट पे
सर टिका कर
उसके जाने के बाद मै पहरों
रोया करता था
वो दरवाज़े जो अबकी खुले
तो शायद मेरे टूटने पर भी
यु फिर बंद न हो पाए
कही बार बार उजड़ता रंग
सब कुछ तबाह न कर जाये|
अधृत

March 8th, 2012 at 4:43 pm
bahut hi acchhi hai…awsome
March 8th, 2012 at 4:46 pm
shukriya….