कशमकश


फिर वही बसंत का महीना| याद है जब वो अपने परिवार के साथ अपने गाँव जा रही थी| मैंने उससे बस इतना ही पूछा कि मै तुझे मिले बिना, तुझसे बात किये बगैर कैसे रहूँगा?
 कुछ पलों कि चुप्पी के बाद उसने मुझे ये कविता सुनाई और कहा रोज़ एक मैसेज करुँगी और फिर तुम ये कविता पढना और आँखे बंद करके मुझको सोचना| आज वो साथ तो नहीं बस ये कविता बिल्कुल वैसे ही डायरी  के पन्नो पे लिखी हुई है जैसा वो छोड़ गयी थी|
सन्नाटे कि चादर ओढ़े
आई कैसी रात सुहानी
सोया है जब जग संसार
मन में आते प्रश्न हज़ार
पलके अपनी जब झपकाऊँ
जाने किस से मै शर्माऊँ
जानू न जाने क्यों नींद न आये
शायद दिल को याद तुम आते
पास जो होते मुझे सुलाते
मिलकर उलझन दूर भागते
तड़प तड़प यु न रात बिताते
क्यों न मन से मन को जोड़े
उलझन कि हर गांठे खोले
मिलन हमारा हो न जबतक
चलो देख ले सपने तबतक
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