नियोग


कभी सोचा है आपने कि आप खुद को कितनी अच्छी तरह से जानते हैं?
 मुझे मालूम है आपका जवाब होगा बहुत अच्छी तरह से|
 पर ज़रा सोचिये कभी आपने इस बात पर गौर फ़रमाया है कि आप कितना बदल गए हो?
 फिर जवाब देंगे आप कि बदलना आपकी फितरत नहीं| 
पर सच्चाई तो ये है कि इंसान  खुद को कितना भी विलग कर ले संसार से,
 रोज़ मर्रा कि जिंदगी में वो नित नयी चीजे सीखता है|
 अच्छी बुरी कई बाते उसके व्यक्तित्व से जुड़ जाती है|
 फुर्सत में एक बार जब मैंने खुद को ही सोचा तो ये अनुभूति हुई मै भी बदल सा गया हु|
 अपने इसी एहसास को शब्दों में ढालने कि कोशिश कि है|
 अच्छा बुरा जैसा भी लगे आपके विचारो का आपकी टिप्पणीयों का इंतज़ार होगा…..

 घर में अकेला बैठा था
सन्नाटे को भेदती 
घडी के कांटो कि आवाज
एहसास दिला रही थी कि
वक़्त गुजरने का नाम ही नहीं ले रहा 
 
तो सोचा कि अपने ही साथ
आज एक शाम बिता लूँ
कमरे के कोने पे पड़ी
उस टेबल पर
खुद से ही ऐप्पोईन्टमेंट भी ले ली
टेबल पर चाय के दो कप
के साथ कुछ नमकीन बिस्कुट भी रख लिए
 
 
चाय कि पहली ही चुस्की के साथ
मैंने खुद से ही गुफ्तगू शुरू की
मकान की तरह भी 
मन भी बिलकुल खाली हो गया
कुछ ही पलो में
 
न कोई ख्याल ही आया
न ही मै कुछ सोच पाया
फिर आँखे बंद की
और ज़िन्दगी की किताब के
पन्ने पलटता गया
 
अतीत से शुरुआत करने की बजाय
मुस्तकबिल के पन्नो को देखने की ख्वाहिश
बेकल किये जा रही थी
 
पहले दो चार सफे पलटे
फिर पूरी किताब छान मारी
आने वाले कल के सफे 
कोरे ही थे
शायद नियति ने अबतक
मेरा अंजाम मुकम्मल नही किया है
 
हाल के सफे तो बस
गलतियों से ही भरे थे
बड़ी कोशिश की कि कुछ तो बदल दूँ
पर हर कोशिश
रायगा गयी
 
फिर माज़ी के कुछ 
हसीं रंगीन सफहात कि ओर
अनचाहे ही मन मुड़ चला
 
बचपन कि निश्छलता 
सादगी को देखकर 
लब मुस्कुरा पड़े 
मन में कई कोपले फुट पड़ी
ठीक वैसे ही जैसे
पहली बरसात के बाद
सूखे लतो में जान सी आ जाती है
 
पर ज्यो ज्यो आज कि ओर 
वापस आता गया
खिली हर कली 
मानो मुरझा सी गयी
 
खुद की ही  याद
मुझे तड़पा सी गयी 
पलटते उन सफहात में मैंने
खुद को बदलते देखा
साफ़ उजले एक  मन पे मैंने
कालिख  को ठहरते देखा 
भरी दुपहरी में मैंने
अँधेरे को फिर पनपते देखा
 
कही खुद से ही नफरत न कर बैठू
इस डर से मैंने
अतीत के कमरे से बाहर निकलना मुनासिब समझा
 
बाहर निकल कर दरवाज़े पे ताला लगाया
और बस चल पड़ा………..

  :-अधृत-:

Advertisements

About adhrut

Will let you know once I figure it out. View all posts by adhrut

2 responses to “नियोग

  • Tapish Gupta

    कमाल है. वास्तव में आत्मविश्लेषण की जरूरत महसूस कराता है.

    • adhrut

      बेहद ख़ुशी हुई यह जानकार कि आप इस नज़्म के मूल को पकड़ पाए| धन्यवाद| इस ब्लॉग पर हिंदी में कुछ और भी रचनाएँ है उम्मीद है आपको पसंद आएँगी|

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: